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Showing posts from November, 2017
तुम से गद्य मेरा तुमसे पद्य, तुमसे ही व्याकरण, मेरे साहित्यिक संसार की तुम अप्रतिम अलंकरण। सौम्य सी काव्यधारा करूँ मैं तुमको अर्पण, रचनाओं कि आकाशगंगा का ये सलिल कण।
Somethings are died before their birth.     
बदलनी थी हमारी तक़दीर ताबीर बदल दी उन्होंने, दिखने लगी जो, दर्द की तासीर तस्वीर बदल दी उन्होंने..!     
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर आज़माया गया, पर उसके इंतज़ार से कठिन कुछ भी न था। उनके हर अल्फ़ाज़ को खुदा जाना हमने, और उन्हें हम पर यकीं कुछ भी न था। इन निगाहों की सोहबत में थे गुलशन, पर उनकी यादों सा हसीं कुछ भी न था। कुदरत ने तराशा था उसे इस कदर, इस जहाँ में उनसा कहीं कुछ भी न था। मेरे अक्स ने तलाशा मुझे हर शहर, मुझमें बचा मैं, अब कुछ भी न था..! ~ अनिमेष चौबे 'शरद'
हौसलों के नग़मों से कुछ तराने लिए चला हूँ, अकेला हूँ सफर मे खुद के अफसाने लिए चला हूँ..!     
तेरी आँखो मे खोना चाहता हूँ, तेरी पलको मे सोना चाहता हूँ, इक पल के लिए ही सही, मैं आज सिर्फ तेरा होना चाहता हूँ। तेरे जज्बातों मे बहना चाहता हूँ, तेरे ख्यालों में रहना चाहता हूँ, दो लफ़्ज़ों कि गुफ्तगू ही सही, मैं सिर्फ तुझसे कुछ कहना चाहता हूँ। मंजिल कि जब परवाह न रहे, उस राह से गुजरना चाहता हूँ, किसी मोड़ पर तुझसे नजरें मिलाना चाहता हूँ, तेरी निगाहों से खुद को रूबरू कराना चाहता हूँ। मैं आज सिर्फ तुझे सोचना चाहता हूँ....! मैं आज सिर्फ तुझे सोचना चाहता हूँ.....!!
हमे शौक नही परेशानियाँ छिपाने कि, कम्बख्त मुस्कुराहट है जो बेवजह बिखर जाती है।
मदहोश होने को दो लफ्ज़ ही काफी थे, सारी रात गुफ्तगू के बाद क्या हाल है, तुम्हें क्या बतलाएँ। यूँ तो परस्तार हैं हम तेरी ज़ुल्फ़ो के, उसके आगोश के बाद क्या हाल है, तुम्हें क्या बतलाएँ। इक बार नजाकत से देखा है तुमने, इस दिल का तब से क्या हाल है, तुम्हें क्या बतलाएँ।     
नजाकतें हैं झुकी नजरों कि अंगड़ाईयों में, कुदरत भी उलझा है आज इन गहराईयों में..!
रातो कि नींदो से सपने खो गए हैं, क्या आज हम इतने बड़े हो गए हैं।    
जिन गलियों से कभी गुजरा नही,                   वहाँ कि हवा बता रहा हूँ मैं..! जिन बारिशों मे कभी भीगा नही,                   उन्हीं के किस्से सुना रहा हूँ मैं..!!
निगाहें तेरी मौजूदगी तलाश ही लेंगे, लब इसी बहाने मुस्कुरा भी लेंगे..! गुजारिशो का दौर चला है आज तो, हम इसी बहाने दिल बहला भी लेंगे..!!
वो मेरे ख्वाहिशों मे जिंदा है,                          मै उसके नजर अंदाजी में 
उसकी महक से हर अल्फाज, नज्मे़ं बन मुस्कुराती हैं वो गुजरे जिन गलियों से वहाँ, बज़्में बन गुनगुनाती हैं
सत्य को करते प्रकाशित छंद हो जाएं, स्वयं को करते संघर्षित द्वंद हो जाएं..! ओजस्विता के अनिमेष बनकर, हर मस्तक आज विवेकानंद हो जाएं..!!
हर अल्फाज मे इक जादू रखती है..! वो शम्मा है, अदाएं बेकाबू रखती है..!! हर वक्त बेचैन रखकर मुझे..! वो मासूम खुद को काबू मे रखती है..!!
जो हवाएँ शांत हो तो तुफान संग लाती हैं..! मेरी खामोशी से ही मेरी शख्सियत रंग लाती है..!!
वो हँसती है वो मुस्कुराती है, कभी- कभी वो इठलाती है, अपनी बेताबियाँ वो मुझे बतलाती है, क्या है पढ़ना वो मुझे सिखलाती है, दिनभर के किस्से सुनाकर, रातभर वो मेरे हिस्से मे आती है, मेरी गुस्ताखियो से रूठकर, वो नादान सी शक्लें बनाती है, अगली मुलाकात का इंतजार देकर, वो हर बार मुझे सताती है......!! फिर अगले रोज़ वो मुझसे मिलने, ख्वाबों मे आकर ख्यालों मे इठलाती है..!!     
मैं आहट बनकर आऊँगा, तुम पायल को खनकाना..! मैं बूँदो मे घुल जाऊँगा तुम, बारिशो मे भीग जाना..!! मैं तुम्हें मनाने को मिन्नते करूँगा, तुम हौले से मुस्कुराना.! मैं वादे हजार करूँगा, तुम हर वादे पर रूठ जाना..!! मैं तुम्हें शब्दों मे गूथूूंंगा, तुम मुझे एहसासो मे पिरोना..! मैं तुम्हें ख्वाबों मे मिलूंगा, तुम मुझे यादो मे संजोना..!!
अनूठी नजाकतें है उन नजरों में इस नजर को समझाए कौन हवाएँ रूख मोड़ लेती हैं उनकी जुल्फों को देखकर इन उंगलियो बतलाए कौन मैखाने सुने हो गए हैं उनकी कशिश से इन होठो को भिगाए कौन आफताब भी शर्माने लगे हैं उसकी रौशनी को देखकर इस जुगनू को चमकाए कौन सारे शहर का कत्ल होते आज उस मासूम को दिखलाए कौन
मुझसे तेरी खफा होने की पीर बड़ी याद आई, माई आज तेरे हाथों की खीर बड़ी याद आई, तेरी आँचल में खिलती थी जब मासूम सी लम्हें, बचपन की वो खुशकिस्मत तकदीर बड़ी याद आई..!
एक धुंधली सी सूरत है तेरी, मेरे नज़रों के दरमियां..! अबतक इसी कश्मकश में हैं, पलके खोल तुझे ढूंढे या बंद नज़रों में ही दीदार हो..!!
किन्हीं दामन में खुशियाँ तो किसी की झोली में गम होगी, शहीदों की करवाचौथ याद कर चाँद की निगाहें भी नम होगी।
कभी उनको पुकारते हैं कभी खुद को तलाशते हैं, सवेरा गुनगुनाते हुए शामें मुस्कुराते हुए गुजारते हैं।
न दिल बहलाया जाता है, न आहें भरी जाती है, आजकल उन्हीं के ख़यालों में ज़िंदगी जी जाती है। कभी उनको पुकारते हैं कभी खुद को तलाशते हैं, सवेरा गुनगुनाते हुए शामें मुस्कुराते हुए गुजारते हैं।
घनी धूप से न डर मुसाफिर आने वाला छाँव तेरा है, रख हौसला खुद पर साथ देने वाला पाँव तेरा है, मंज़िल भी खूबसूरत होगी राहें भी खुशनुमा होंगी, रुकावटों से संभल चलते रहना आने वाला गाँव तेरा है।     
जिंदगी संवरती है जिनके मुस्कुराने से, ऐसे कुछ अपने मिले हैं कुदरत के खजाने से। तराशने को मुझे किसी जमाने से, उन्होंने खुद को उलझाया इस बेगाने से। जब भी देखा उन्हें किसी बहाने से, लब बाज़ नही आये गुनगुनाने से। मुद्दतों बाद भी उन्हें अपना सा लगेगा, लिख जाएंगे कुछ ऐसे अफ़साने से।
कर्मपथ पर कर्तव्यपरायण रहे हरदम वो वीर,  स्वयं निमंत्रित किया जिन्होंने वक्षो पर तीर, है नमन उन सपूतों की, उनकी प्रेरणा को जिनके दीप्ति से रौशन न जाने कितनों की तकदीर..!
सुना है, तुम रूठी हुई बड़ी अच्छी लगती हो और मैं तुम्हें मनाते हुए...!! सुना है, तुम मुस्कुराते हुए बड़ी अच्छी लगती हो और मैं तुम्हें सताते हुए....!!
किसके छुअन का असर है, फूलों में ये अजब सी ख़ुशबू कैसी, कौन गुजरा है यूँ कस्तूरी लिए, इन बागों में ये बहार कैसी। कभी सितारे टूटते हैं कभी चाँद छुप जाते हैं, आसमान में जुगनुओं की ये आफताब कैसी। निगाहों में तेरी तस्वीर सजाकर हमारा अंदाज ही अलग है, न जाने तू जिनके पास होगी उनकी हालत कैसी। इश्क़ करने की गुस्ताखी की है बस इजहार से चुके हैं हम, जो न रखते लिहाज तुम्हारा, ये शबाब कैसा ये जुस्तजू कैसी।
ये कैसा हादसों का मंज़र है मेरे देश में, इंसानियत जख़्मी है, इंसानों के भेष में..!