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Showing posts from October, 2018
तुम एक ख़्वाब के सिवा कुछ भी नहीं हम एक आरज़ू के सिवा कुछ भी नहीं मोहब्बत क्या है, तुम्हारे जेहन में 'शरद' दिलों में जुस्तजू के सिवा कुछ भी नहीं ~ तुम्हारा अनिमेष
कैसी होगी वो धरा, जाने कैसा 'समा' होगा नशे में होगी हवा और झूमता आसमां होगा नज़रे रहेंगी "अनिमेष", जाने ऐसा कहां होगा मुस्कुराती होगी तुम और निहारता जहां होगा ~ तुम्हारा अनिमेष @kavishala
एक घटना घटी कल हमारे मोहल्ले रहते थे जहां सभी "कर्मठ" निठल्ले तड़के सुबह श्रीमान डकैत आए निकालो दौलत सारी वो चिल्लाए कहने को थोड़ा बहुत, सभी घबराए बगल के घर में देख उनको मुस्कुराए तीन मंजिला मकान थी पड़ोसी की जहां मुहर लगी थी गरीबी रेखा की निकले दरोगा देख यह लूट का सारा खेल बोले जब तक हिस्सा, तब तक अपना मेल तभी छत पर ही दिखे जज साहब मुचलके का लगा रहे थे वो हिसाब बच्चों को कहानी सुना रहे थे "कथाकार" बुराई का करो विरोध नहीं तो जीवन बेकार खिड़की से झांक रहे थे प्रतिष्ठित कलाकार रो रो कर जिन्होंने मचा दिया था हाहाकार चित्रकार कर रहे थे परिस्थिति का चित्रण अधिकारियों में हो रहा था मिठाई का वितरण हमें सब समझते थे क्रांतिकारी कवि व्यस्त थे हम भी बनाने में अपनी छवि लूटने के बाद डकैतों ने सुशासन पर भाषण दिया समेट माल सारा फिर पार्टी कार्यालय प्रस्थान किया सूचना मिलने पर संपादक जी ने खोया आपा अगले ही दिन पूरा घटनाक्रम अखबार में छापा मेरे पड़ोसी पर कल पड़ा डकैतों का साया सारे मोहल्ले में मेरे सिवा कोई काम न आया
चेहरे की हो मुस्कान तुम्हीं से, आने का हो ये तौर तुम्हारा आंगन में हो महक तुम्हीं से, खुशबू का हो ये दौर तुम्हारा ~ तुम्हारा अनिमेष जाने कौन सी मोहबब्त किस अंजाम तक जाती है इक तेरे नाम से ही हमारी हर बात थम सी जाती है ~ तुम्हारा अनिमेष
ज़िंदगी गुजरी कुछ ऐसी कहने को कोई बात नहीं एक तेरी याद है, जिसके सिवा हमें कुछ याद नहीं ~ तुम्हारा अनिमेष जाने दर्द है दवा है या ज़ख्म है मरहम है तेरे होने ना होने का भी अजब सा गम है ~ तुम्हारा अनिमेष
कोई तो सीखिये उनसे बातें बनाना, बातों ही बातों से दिलों को बहलाना चमकते रहे उम्र भर और कभी सितारे नहीं हुए गैरों कि क्या कहें हम खुद कभी हमारे नहीं हुए चाय अब भी जीभ जलाया करती है और तुम अब भी दिल...! जब बातें करती, हो मधुर कोलाहल चिड़ियों सी चमकती आखें कहती कहानी फुलझड़ीयों सी तिमिर से जो हो लड़ रहा मैं वो चिराग हूँ होगी सहर इस रात की इक यही आस हूँ महफिलें सजाना, तहजीब के नगमें सुनाना याद आता है हमें उनका बातों के गुब्बारे उड़ाना चाहत नहीं मोहब्बत भरी मुलाकात होती रहे आरज़ू है किश्तों में ही सही पर बात होती रहे मुश्किल है बहुत उनको दिल कि बात बताना ज़िन्दगी को हो ज़िन्दगी के जज़्बात समझाना