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Showing posts from March, 2018
सत्ता के मतवाले न जाने क्या-क्या कयास लगाए बैठे हैं उन्हें लगता है कि भूखे पेट 'मंदिर' की आस लगाए बैठे हैं ~ अनिमेष सरिता चौबे
आँखों में उम्मीद लिए, चेहरे पर मुस्कान लिए हौसलों की कश्ती में, सपनो का जहान लिए कल एक सुबह होगी, लाखों शाम लिए कल लाखों ज़ुबां होंगी, सिर्फ तुम्हारा नाम लिए ~ अनिमेष सरिता चौबे

कुछ अल्फ़ाज़

लफ़्ज़ों से बता न सके इशारों में जता न सके क्या क्या छिपा रखा है तुम्हें कभी दिखा न सके मेरे अश्क़ों का जाम उसे बड़ा अच्छा लगता है कह दूँ उसका नाम तो उसे बड़ा अच्छा लगता है मैं लिख रहा हूँ अपनी ही बर्बादी का अंजाम और लफ़्ज़ों का ये काम उसे बड़ा अच्छा लगता है वो नादानियां वो मौसम न हुए बिछड़कर तुमसे हम 'हम' न हुए सफ़ीने के दिल में लहरों की जुस्तजू कमाल की है साहिल के फिर डूब जाने की आरज़ू कमाल की है रात के दामन से दर्द भरी शाम लिया करता हूँ इस तन्हाई में बस तेरा ही नाम लिया करता हूँ बेचैनी, बेपरवाही, बेखुदी का हिसाब लगा रही हो, 'साकी' जिसके लफ़्ज़ों में नशा है तुम उसे शराब पिला रही हो..!!