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Showing posts from May, 2018
बचपन की वो गुमशुदा हलचल ढूँढता हूँ रंज-ओ-ग़म में अब तेरा आँचल ढूँढता हूँ मैं तुझे ढूंढता हूँ वो मौसम रूहानी ढूँढता हूँ सावन तो कभी तेरी कही कहानी ढूँढता हूँ तुझे क्या ख़बर की हर शय में तुझे ढूँढता हूँ अपनी की गलतियों की अब सजा ढूँढता हूँ ~ तुम्हारा अनिमेष
मुलाक़ात थी उनसे मिलने की ख़ातिर नींद, चैन, अक्स अब उनमें ही गुम है ~ तुम्हारा अनिमेष कुरेदा जो ज़ख्म को अश्क़ ही मरहम निकला तुमसे ज़्यादा तुम्हारा गम मेरा हमदम निकला ~ तुम्हारा अनिमेष नींव से लेकर गुबंद तक, सब उनकी नक्काशी है देह दमकता वृंदावन सा कर्म ही मथुरा- काशी है चट्टान तोड़ती बाहें हो या मंज़िल को जाती राहें मेहनतकश मजदूरों का सारा जग अभिलाषी है ~ अनिमेष सरिता चौबे तुम्हारी महफिलों से दूर बहुत हूँ अपनी दुनिया में मशहूर बहुत हूँ वास्ता नही है मतलबी रिवाज़ों से अपने उसूलों में मगरूर बहुत हूँ ~ तुम्हारा अनिमेष हर घड़ी बिखर रहा हूँ हर पल निखर रहा हूँ ~ तुम्हारा अनिमेष दिलों की रियासत के हम भी नवाब थे पर तुम्हारे बग़ैर इक मुफ़्लिसी सी रही ~ तुम्हारा अनिमेष