Posts

 कुचल दिया थाली की रोटी गर भूख कुचल देते, अच्छा होता कुचल दिया सपनों को सारे गर आँखें कुचल देते, अच्छा होता कुचल दिया ये जिस्म जो तूने,  खैर कोई बात नहीं गर कुचल देते शिकवे सारे, अच्छा होता चलते कुचलने हर दर्द दिलों की गर हम तुम मिलते, अच्छा होता ~ तुम्हारा अनिमेष
 रात के पृष्ट पर, चांद लिखते हुए स्याही रुप से तेरे, मैं बनाता रहा रात के पृष्ट पर चांद लिखते हुए फूलों के जिस्म पर, खुशबू लिखते हुए महक बदन से तेरे, मैं चुराता रहा फूलों के जिस्म पर, खुशबू लिखते हुए ~ तुम्हारा अनिमेष
 रात होना पर चांद का ना होना फूलों का होना, पर खुशबू का ना होना कुछ ऐसा ही है इस जहां का होना, पर जहां में तेरा ना होना ~ तुम्हारा अनिमेष
 मिल चुके हैं ख़ाक में... और वो बेखबर है कबसे अब निकल चुकी है ’जान’.. और ’जान’ खफा है कबसे.. ~ तुम्हारा अनिमेष
 जाने कौन सी बात आखिरी जाने कौन सी तकरार आखिरी थमते हुए इन सांसों की जाने कौन सी इकरार आखिरी ~ तुम्हारा अनिमेष
 गहरी सी आंखे थी आंखों में वादा था वादे में मुलाक़ात था मुलाक़ात में मेरे दोस्त आंखों के सिवा कुछ ना था ~ तुम्हारा अनिमेष
 इलाज़ न मिले, घुटते रहे चाहे दम सरकारी फ़रमान है की सब ठीक है शमशान बना हो चाहे शहर सारा सरकारी ऐलान है, की सब ठीक है ~ तुम्हारा अनिमेष