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Showing posts from February, 2019
तेरे चेहरे के रंगों में ढला है फाल्गुन तेरे मुस्कुराहटों पे निढाल है फाल्गुन ~ तुम्हारा अनिमेष प्रकृति बदली परिवेश बदला मानव हुआ विकसित वानर से फिर भी रह गए कुछ वानर, 'वानर' ~ अनिमेष सरिता चौबे
अजब रिवाज़ चला है इस दौर-ए-मोहब्बत में पूरे गुलिस्तां को एक फूल से नवाजा जाता है ~ तुम्हारा अनिमेष
स्याह रात में दिया जलाकर क्या कीजिएगा अंधे शहर को रौशनी दिखाकर क्या कीजिएगा तमाशबीन है ये जहां, गर बात ये मान भी लें खुद का ही तमाशा बनाकर क्या कीजिएगा जिस दौर में अपनों का लहजा हो परायों सा उस दौर में सबको अपना बनाके क्या कीजिएगा जिन शहरों के दिलों में भरी हो नफरतें उन शहरों में मोहब्बत लुटाकर क्या कीजिएगा ~ तुम्हारा अनिमेष