मैखाने कि दीवानगी ऐसी अक्स खुद का भूल गए, मुस्काया उसने कुछ इस कदर मैखाना भूल गए। पूछता है हर शख्स इस मदहोशी का नाम, उन्हे कैसे बताएं अब हम खुद का नाम भूल गए। अनिमेष चौबे 'शरद'
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Showing posts from June, 2017
अभी मुझे लिखना नही आया
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रक्त पिपासु सरकार को दम तोड़ती न्याय को क्या मैं ललकार पाया सत्य तो यह है, अभी मुझे लिखना नही आया। भूखे पेट कि वेदना को जनमानस की चेतना को क्या मैं कह पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। किसी प्रेम के विरह को युगलो के जिरह को क्या मैं शब्द दे पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। किसानो की पीड़ा को व्यवस्था कि क्रिड़ा को क्या मैं समझा पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। कंपनियों के चाल को सामंतो के ढाल को क्या तुम्हें आगाह कर पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। क्रांति कि मशाल का त्याग के मिसाल का क्या मैं अग्रदूत बन पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। मातृत्व के स्नेह को समर्पण के देह को क्या मैं व्यक्त कर पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। प्रकृति के गान को सौंदर्य के पहचान को अबतक सजा नही पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। लिखने की कोशिश मे वाह और तारीफो में खो आया सत्य तो यह है कविता तो लिख दी किंतु पढ़ना नही आया। अनिमेष चौबे 'शरद'
मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु
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मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु, पहली पइसा फेर ईमान, पी के घोलंड के, गाँव के सियान, मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। कोलखी म चलत हे स्कूल, फेर दारू दुकान आघु, मोर छत्तीसगढ़ ह दउड़त हे बाबु। समारू के गाँव म नक्सली आगे, हक के लड़ाई कही के स्कूल जलागे, मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। नोनी के लाज सिरागे, बाबु पियत दारू दिन पहागे, मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। परदेसिया पूरा भूईयाँ पोगरागे, सरपंच ह उहें बिसागे, मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। छत्तीसगढ़ी भाखा बोलईया गवाँगे, संस्कृति के नरवा ढिलागे, मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। गाँव के मनखे शहर भगागे, मोर नारधा के तरिया सुखागे, मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। पिरा ल गोठियाबे 'शरद' अब काखर आघु, सब झन इही कहिथे मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। अनिमेष चौबे 'शरद'