Posts

Showing posts from June, 2017
मैखाने कि दीवानगी ऐसी अक्स खुद का भूल गए, मुस्काया उसने कुछ इस कदर मैखाना भूल गए। पूछता है हर शख्स इस मदहोशी का नाम, उन्हे कैसे बताएं अब हम खुद का नाम भूल गए। अनिमेष चौबे 'शरद'
शब्द थम से गए हैं, एहसास जम से गए हैं इक झलक का ये कैसा असर, हुआ क्या मुझ पर, कुछ तो बताया जाए। बहुत नाज़ है चाँद को अपनी चाँदनी पर, एक दीदार आपका,उसे भी कराया जाए। अनिमेष चौबे 'शरद'
मदहोश होने को दो लफ्ज़ ही काफी थे, सारी रात गुफ्तगू के बाद क्या हाल है, तुम्हें क्या बतलाएँ। यूँ तो परस्तार हैं हम तेरी ज़ुल्फ़ो के, उसके आगोश के बाद क्या हाल है, तुम्हें क्या बतलाएँ। इक बार नजाकत से देखा है तुमने, इस दिल का तब से क्या हाल है, तुम्हें क्या बतलाएँ। अनिमेष चौबे 'शरद'
हमे शौक नही परेशानियाँ छिपाने कि, कम्बख्त मुस्कराहट है जो बेवजह बिखर जाती है। अनिमेष चौबे 'शरद'
तेरी यादो कि महक सौंधी खुशबू संग आ रही है, ये बरसात आज सारे हसीन लम्हे भीगा रही है। अनिमेष चौबे 'शरद'

अभी मुझे लिखना नही आया

रक्त पिपासु सरकार को दम तोड़ती न्याय को क्या मैं ललकार पाया सत्य तो यह है, अभी मुझे लिखना नही आया। भूखे पेट कि वेदना को जनमानस की चेतना को क्या मैं कह पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। किसी प्रेम के विरह को युगलो के जिरह को क्या मैं शब्द दे पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। किसानो की पीड़ा को व्यवस्था कि क्रिड़ा को क्या मैं समझा पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। कंपनियों के चाल को सामंतो के ढाल को क्या तुम्हें आगाह कर पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। क्रांति कि मशाल का त्याग के मिसाल का क्या मैं अग्रदूत बन पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। मातृत्व के स्नेह को समर्पण के देह को क्या मैं व्यक्त कर पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। प्रकृति के गान को सौंदर्य के पहचान को अबतक सजा नही पाया सत्य तो यह है अभी मुझे लिखना नही आया। लिखने की कोशिश मे वाह और तारीफो में खो आया सत्य तो यह है कविता तो लिख दी किंतु पढ़ना नही आया। अनिमेष चौबे 'शरद'
हर झरने की कल-कल में झंकार तुम्हारी है सुहावने इस दृश्य में तस्वीर तुम्हारी है सच हो तुम या हो कोई स्वप्न मधुर खुद से निरंतर यह सवाल जारी है अनिमेष चौबे 'शरद'

मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु

मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु, पहली पइसा फेर ईमान, पी के घोलंड के, गाँव के सियान, मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। कोलखी म चलत हे स्कूल, फेर दारू दुकान आघु, मोर छत्तीसगढ़ ह दउड़त हे बाबु। समारू के गाँव म नक्सली आगे, हक के लड़ाई कही के स्कूल जलागे, मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। नोनी के लाज सिरागे, बाबु पियत दारू दिन पहागे, मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। परदेसिया पूरा भूईयाँ पोगरागे, सरपंच ह उहें बिसागे, मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। छत्तीसगढ़ी भाखा बोलईया गवाँगे, संस्कृति के नरवा ढिलागे, मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। गाँव के मनखे शहर भगागे, मोर नारधा के तरिया सुखागे, मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। पिरा ल गोठियाबे  'शरद' अब काखर आघु, सब झन इही कहिथे मोर छत्तीसगढ़ ह दऊड़त हे बाबु। अनिमेष चौबे 'शरद'