अभी मुझे लिखना नही आया
रक्त पिपासु सरकार को
दम तोड़ती न्याय को
क्या मैं ललकार पाया
सत्य तो यह है,
अभी मुझे लिखना नही आया।
भूखे पेट कि वेदना को
जनमानस की चेतना को
क्या मैं कह पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
किसी प्रेम के विरह को
युगलो के जिरह को
क्या मैं शब्द दे पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
किसानो की पीड़ा को
व्यवस्था कि क्रिड़ा को
क्या मैं समझा पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
कंपनियों के चाल को
सामंतो के ढाल को
क्या तुम्हें आगाह कर पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
क्रांति कि मशाल का
त्याग के मिसाल का
क्या मैं अग्रदूत बन पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
मातृत्व के स्नेह को
समर्पण के देह को
क्या मैं व्यक्त कर पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
प्रकृति के गान को
सौंदर्य के पहचान को
अबतक सजा नही पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
लिखने की कोशिश मे
वाह और तारीफो में खो आया
सत्य तो यह है
कविता तो लिख दी किंतु पढ़ना नही आया।
अनिमेष चौबे 'शरद'
दम तोड़ती न्याय को
क्या मैं ललकार पाया
सत्य तो यह है,
अभी मुझे लिखना नही आया।
भूखे पेट कि वेदना को
जनमानस की चेतना को
क्या मैं कह पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
किसी प्रेम के विरह को
युगलो के जिरह को
क्या मैं शब्द दे पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
किसानो की पीड़ा को
व्यवस्था कि क्रिड़ा को
क्या मैं समझा पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
कंपनियों के चाल को
सामंतो के ढाल को
क्या तुम्हें आगाह कर पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
क्रांति कि मशाल का
त्याग के मिसाल का
क्या मैं अग्रदूत बन पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
मातृत्व के स्नेह को
समर्पण के देह को
क्या मैं व्यक्त कर पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
प्रकृति के गान को
सौंदर्य के पहचान को
अबतक सजा नही पाया
सत्य तो यह है
अभी मुझे लिखना नही आया।
लिखने की कोशिश मे
वाह और तारीफो में खो आया
सत्य तो यह है
कविता तो लिख दी किंतु पढ़ना नही आया।
अनिमेष चौबे 'शरद'
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