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Showing posts from April, 2021
 समय साथ संघर्ष विशेष स्मृति, स्पंदन, स्पर्श शेष ~ तुम्हारा अनिमेष
 क़यामत तो फिर भी एक दिन ठहर ही जायेगी तेरी 'मुस्कुराहट' का जाने क्या सिलसिला होगा ~ तुम्हारा अनिमेष ना मोहब्बत में किसी के, ना गिला किसी का ऐ मेरे दिल फिर तू इतना तेज़ धड़कता क्यूं है ~ तुम्हारा अनिमेष संग तेरे पल गुजरता है आहिस्ता आहिस्ता....... देख तुम्हें सूरज पिघलता है आहिस्ता आहिस्ता.. ~ तुम्हारा अनिमेष
 धीरे है ये दुनियां तेज़ धड़कते दिल से कोलाहल है यहां सबकुछ सिवा तेरे होने के सुकून से ठंडी है हर चीज़ जहां की गर्म आसुओं की बूंदों से सूखा है समंदर सारा हाथो पे तेरे चुम्बन से तबतक खूबसूरत है ये दुनियां साथ बना रहे जबतक तुझसे ~ तुम्हारा अनिमेष
 कैसे बतलाएं की इक नाम से ही क्या - क्या होता है कभी धड़कन बढ़ जाती है कभी आंखों में चमक होता है ~ तुम्हारा अनिमेष अब इतना भी ना बरस की सैलाब आ जाए तू नज़र में रहे, और तेरा ही ख़्वाब आ जाए ~ तुम्हारा अनिमेष 
 चांद गुजरा क़रीब से और हमें खबर नहीं सितारा टूटा क़रीब से और चांद को खबर नहीं भंवरा उड़ा करीब से और फूलों को खबर नहीं फूल गिरा मुरझाकर और शाखों को खबर नहीं उठ गया शहर सारा और सूरज को खबर नहीं सूरज डूबा शाम को और चिड़ियों को खबर नहीं ये कैसा दौर है बेफ़िक्री का अब हमें खबर नहीं
 मैं सूरज था, रौशनी का चांद के लिए ढल गया मैं पानी था नदी का पेड़ों के लिए रुक गया मैं पत्ता था पेड़ों का टहनियों के लिए सुख गया मैं टहनी था जंगल का सूरज के इंतज़ार में जल गया ~ तुम्हारा अनिमेष
 कयामत उठ जाती है इशारे पर और लोग इसे अदा कहते हैं..!! ढूंढ लाओ उस कारीगर को  लोग जिसे ख़ुदा कहते हैं.....!!! ~ तुम्हारा अनिमेष आप से तुम तक का सफ़र कभी पल भर का  कभी मीलों का सफ़र आप से तुम तक का सफ़र ~ तुम्हारा अनिमेष
 जो तुम रहती तो अच्छा होता जो तुम कहती तो अच्छा होता,  ये होता तो अच्छा होता,  वो होता तो अच्छा होता ~ तुम्हारा अनिमेष कभी देखते हुए तुम्हे ज़माना गुज़र गया आज देखे हुए तुम्हें, ज़माना गुज़र गया ~ तुम्हारा अनिमेष
 कही पर कहूं , या अनकही पर कहूं साकी बता मैं किस अंदाज़ पर कहूं  ~ तुम्हारा अनिमेष जो तेरे ज़ुल्म की इंतहा है वही मेरे सब्र की इंतहा है झूठ - फरेब चाहे जो आज़माले मौत ही मेरी मोहब्बत की इंतहा है ~ तुम्हारा अनिमेष (इंतहा :- अंतिम सीमा)
 रात होना पर चांद का ना होना फूलों का होना, पर खुशबू का ना होना कुछ ऐसा ही है इस जहां का होना, पर जहां में तेरा ना होना ~ तुम्हारा अनिमेष
 हम सबपे कुछ न कुछ उधार है सागर पर नदियों का उधार है नाव का पतवारों पर उधार है पंछियों का पेड़ो पर उधार है शाम का सुबह पर उधार है एक बात, एक नाराज़गी और  एक चाय का तेरा मुझ पर उधार है ~ तुम्हारा अनिमेष
 मिल चुके हैं ख़ाक में... और वो बेखबर है कबसे अब निकल चुकी है ’जान’.. और ’जान’ खफा है कबसे.. ~ तुम्हारा अनिमेष
 जाने कौन सी बात आखिरी जाने कौन सी तकरार आखिरी थमते हुए इन सांसों की जाने कौन सी इकरार आखिरी ~ तुम्हारा अनिमेष
 जो तुमसे मिले तो मर जाएंगे जो तुमसे न मिले तो मर जाएंगे जिसका घर हो तेरे दर के सामने बता अब वो लोग कहां जायेंगे.. नज़र मिला के बढ़ा देती हो जिंदगी जो हमसे मिली नजरें तो मर जाएंगे तुझे जाना है तो ये बता के जा तेरे जाने के बाद  ये रस्ते, घर, गलियां कहां जाएंगे ~ तुम्हारा अनिमेष
मिटा दे हर याद को, ऐसा मरहम बांट देना हो सके तो इस चुनाव में, कफ़न बांट देना ~ तुम्हारा अनिमेष