कही पर कहूं , या अनकही पर कहूं
साकी बता मैं किस अंदाज़ पर कहूं
~ तुम्हारा अनिमेष
जो तेरे ज़ुल्म की इंतहा है
वही मेरे सब्र की इंतहा है
झूठ - फरेब चाहे जो आज़माले
मौत ही मेरी मोहब्बत की इंतहा है
~ तुम्हारा अनिमेष
(इंतहा :- अंतिम सीमा)
कही पर कहूं , या अनकही पर कहूं
साकी बता मैं किस अंदाज़ पर कहूं
~ तुम्हारा अनिमेष
जो तेरे ज़ुल्म की इंतहा है
वही मेरे सब्र की इंतहा है
झूठ - फरेब चाहे जो आज़माले
मौत ही मेरी मोहब्बत की इंतहा है
~ तुम्हारा अनिमेष
(इंतहा :- अंतिम सीमा)
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