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Showing posts from November, 2018
थक जाओगे तुम एक दिन हमसे किनारा करते करते आयेगी हमारी महक तुमसे यूं हीं किनारा करते करते जी रहें हैं गमों के जहां में हंसी को गवारा करते करते महफिलों की शब में आंसूओं को सितारा करते करते मिला कुछ भी नहीं हमें हर वक़्त तुम्हारा करते करते अब खो दिया है खुदको, सबकुछ तुम्हारा करते करते जिसे पाया गैरों में, वो ढूंढ रहा है सहारा करते करते खोया था जिसे अपनों में, हमनें बेसहारा करते करते ~ तुम्हारा अनिमेष
आशिक़ हुए हैं रौशन बहुत महताब की तरह हम तो रौशनी लुटाते रहे, आफ़ताब की तरह ~ तुम्हारा अनिमेष उजियारी प्रातः बेला सी राधा रानी श्यामल सांझ कन्हैया मेरे कृपलानी ~ तुम्हारा अनिमेष
जैसी हो शख्सियत वैसा किरदार अब गढ़ता कौन है आज के दौर में दूसरों का लिखा, अब पढ़ता कौन है ~ तुम्हारा अनिमेष मिला ना खरीददार हमें हमारी वफ़ा का हमने सारे बाज़ार को, बेवफ़ा कह दिया ~ तुम्हारा अनिमेष वो बातें बनाना हो या हंसना हंसाना मुश्किल है अकेले कदमों को चलाना ~ तुम्हारा अनिमेष
आती हैं तितलियां जैसे बागों में आना कभी तुम हमारे ख्वाबों में ~ तुम्हारा अनिमेष
अटखेलियां करता खोले दामन सारा देख जिसे खिलखिलाता आंगन सारा बचपन महका जैसे हो उपवन सारा यादों में जिसके गुज़ारा जीवन सारा ~ तुम्हारा अनिमेष अजब है इश्क़ की राह, अजब है इश्क़ का काम हमसे मोहब्बत ही पूछे हमारी मोहब्बत का नाम ~ तुम्हारा अनिमेष