जैसी हो शख्सियत वैसा किरदार अब गढ़ता कौन है
आज के दौर में दूसरों का लिखा, अब पढ़ता कौन है

~ तुम्हारा अनिमेष

मिला ना खरीददार हमें हमारी वफ़ा का
हमने सारे बाज़ार को, बेवफ़ा कह दिया

~ तुम्हारा अनिमेष

वो बातें बनाना हो या हंसना हंसाना
मुश्किल है अकेले कदमों को चलाना

~ तुम्हारा अनिमेष


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