एक घटना घटी कल हमारे मोहल्ले
रहते थे जहां सभी "कर्मठ" निठल्ले

तड़के सुबह श्रीमान डकैत आए
निकालो दौलत सारी वो चिल्लाए

कहने को थोड़ा बहुत, सभी घबराए
बगल के घर में देख उनको मुस्कुराए

तीन मंजिला मकान थी पड़ोसी की
जहां मुहर लगी थी गरीबी रेखा की

निकले दरोगा देख यह लूट का सारा खेल
बोले जब तक हिस्सा, तब तक अपना मेल

तभी छत पर ही दिखे जज साहब
मुचलके का लगा रहे थे वो हिसाब


बच्चों को कहानी सुना रहे थे "कथाकार"
बुराई का करो विरोध नहीं तो जीवन बेकार

खिड़की से झांक रहे थे प्रतिष्ठित कलाकार
रो रो कर जिन्होंने मचा दिया था हाहाकार

चित्रकार कर रहे थे परिस्थिति का चित्रण
अधिकारियों में हो रहा था मिठाई का वितरण

हमें सब समझते थे क्रांतिकारी कवि
व्यस्त थे हम भी बनाने में अपनी छवि

लूटने के बाद डकैतों ने सुशासन पर भाषण दिया
समेट माल सारा फिर पार्टी कार्यालय प्रस्थान किया


सूचना मिलने पर संपादक जी ने खोया आपा
अगले ही दिन पूरा घटनाक्रम अखबार में छापा


मेरे पड़ोसी पर कल पड़ा डकैतों का साया
सारे मोहल्ले में मेरे सिवा कोई काम न आया




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