हमारा उनसे नज़रें उलझाना,
शरमा के उनका पलकें झुकाना..!

उनकी निगाहों का हमसे टकराना,
सहम के हमारा नज़रें चुराना..!!

यही सिलसिला है और यही बहाना,
रोज दोहराते है यही अफ़साना..!!!

~ अनिमेष चौबे 'शरद'

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